May 19, 2024

देहरादून में गरजे मजदूर संगठन: अपने वादों को पूरा करो, गरीब मजदूरों को बेघर मत करो!

देहरादून। सरकार द्वारा लगातार न्यायालय के आदेशों के बहाने मजदूर व गरीब लोगो को बेघर करने के खिलाफ मजदूर संगठनों में भारी आक्रोश है। इसे देखते हुए दीन दयाल पार्क में मजदूर संगठनों, राजनीतिक व सामाजिक संगठनों ने धरना दिया। इस मौके पर भारी संख्या में राज्य के मज़दूर संगठनों एवं राजनीतिक दलों प्रतिनिधि एवम  मजदूर और गरीब लोग मौजूद रहे।

इस मौके पर जनसभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सरकार अदालत के आदेशों का बहाना बना कर देहरादून में अभी भी मज़दूरों को बेघर करना चाह रही है, जबकि यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि सरकार ने पिछले आठ सालों में अपने ही वादों पर कोई काम नहीं किया और जारी याचिकाओं में भी घोर लापरवाही की है। सवाल यह है कि जब सरकार को पता है कि मज़दूर सिर्फ और सिर्फ बस्ती में रह सकते हैं, तो इसके लिए व्यवस्था न कर बार बार उजाड़ना मजदूरों के साथ ज्यादती व अत्याचार है। वक्ताओं ने कहा कि जून 2024 में, 2018 में लाया गया अधिनियम भी ख़तम हो रहा है, जिसके बाद किसी भी बस्ती को कभी भी उजाड़ा जा सकता है, और इस पर भी सरकार खामोश है। वक्ताओं ने यह भी कहा कि सरकार की लापरवाही यहाँ तक रही कि आखरी सुनवाई में वे हाज़िर ही नहीं हुए। इसी प्रकार की जनविरोधी मानसिकता और मुद्दों पर भी दिख रहा है  कि शहर में वेंडिंग जोन को न घोषित कर ठेली वालों को हटाया जा रहा है और पर्वतीय क्षेत्रों में वन अधिकार कानून पर अमल न कर लोगों को हटाया जा रहा है। शहरों और ग्रामीण इलाकों में भी बड़े बिल्डर, निजी कंपनी एवं सरकारी विभागों ने अनेक नदियों और नालियों पर अतिक्रमण किये हैं लेकिन उन पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। उल्टा दुष्प्रचार किया जाता है कि ये मुद्दे “बाहर” के लोगों के मुद्दे हैं, जबकि राज्य के सारे गरीब और आम लोग इनसे प्रभावित हैं।

जनसभा द्वारा इन मांगों पर जोर दिया गया:

1. अपने ही वादों के अनुसार सरकार तुरंत बेदखली की प्रक्रिया पर रोक लगाए, चाहे क़ानूनी संशोधन द्वारा या कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील द्वारा।

2. जब तक नियमितीकरण और पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी नहीं होगी, तब तक 2018 का अधिनियम को एक्सटेंड किया जाये।

3. दिल्ली सरकार की पुनर्वास नीति को उत्तराखंड में भी लागू किया जाये।

4. राज्य के शहरों में उचित संख्या के वेंडिंग जोन को घोषित किया जाये।

5. पर्वतीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में वन अधिकार कानून पर अमल युद्धस्तर पर किया जाये।

6. बड़े बिल्डरों एवं सरकारी विभागों के अतिक्रमण पर पहले कार्यवाही की जाये।

7. 12 घंटे का काम करने के कानून, चार नए श्रम संहिता और अन्य मज़दूर विरोधी नीतियों को रद्द किया जाये और न्यूनतम वेतन को 26,000 किया जाये।

इस मौके पर जनसभा की और से मुख्यमंत्री के नाम पर ज्ञापन अपर तहसीलदार को सौंपा गया। प्रभावित जनता की और से ज्ञापन को नगर निगम में नगर आयुक्त के कार्यालय में सौंपा गया।

जनसभा को INTUC के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व कैबिनेट मंत्री हीरा सिंह बिष्ट; CITU के प्रदेश अध्यक्ष राजेंद्र नेगी, प्रदेश सचिव लेखराज, AITUC के प्रदेश उपाध्यक्ष समर भंडारी, प्रदेश सचिव अशोक शर्मा, चेतना आंदोलन के शंकर गोपाल, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव डॉ एस.एन. सचान, माकपा के जिला सचिव राजेंद्र पुरोहित, कर्मचारी महासंघ के एस.एस. नेगी, और एस.एफ.एफ.के राज्य सचिव हिमांशु चौहान, अध्यक्ष नितिन मलेठा, जय कृत कंडवाल, इफ्टा के हरिओम पाली, अर्जुन रावत आदि ने सम्बोधित किया।

इस मौके पर भीम आर्मी के महानगर अध्यक्ष आज़म खान, माकपा के अनंत आकाश, कृष्ण गुनियाल, राम सिंह भंडारी, रविन्द्र नौढियाल, भगवंत पयाल, शैलेन्द्र परमार सहित बड़ी संख्या में सैकड़ो की संख्या में प्रभावित लोग मौजूद रहे।

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